हे विधाता आखिर तुझे क्या हो गया है

काल की क्रूर मार
हे विधाता आखिर तुझे क्या हो गया है ?
तू इतना निर्दयी कैसे हो सकता हैं
भौतिक सुख सुविधाओं में व्रद्धि को हम विकास बोलते है और इसी  विकास के दुरुपयोग हमे विनाश की ओर धकेल देता हैं
एक व्यक्ति की लापरवाही ने हजारो आंखों में आंसू भर दिए ।
मान लिया जाए
की होनी को कोई नही टाल सकता हैं
किन्तु जो अनहोनी हमारी ही लापरवाही के चलते घट जाए उसको क्या बोलेंगे ?
मन को कैसे समझाए की यह तो होना ही था
यह एक व्यक्ति के क्षणिक गलत निर्णय के चलते ही सब कुछ अनर्थ हुआ है ।
चौड़ी और सपाट सड़के जहाँ हमारे आवागमन के लिए सुगम पथ हैं वही इन पर लापरवाही जानलेवा कीमत वसूलती हैं ।।
जाने वाले तो पल भर में ही इस जगत को अलविदा कह गए किन्तु जो अभी भी जीवित हैं वे ताजिंदगी इसको कैसे भूलेंगे ?
पहले सड़क दुर्घटनाओं के बारे में अखबार में पढ़ते थे
किन्तु
पिछले चार पांच वर्षों में बाड़मेर जिले में भी
ऐसा कोई भी दिन नही गुजरता हैं जब बिना सड़क एक्सीडेंट का सूर्यास्त हो जाए
इन आए दिन घटित होने वाले रोड़ एक्सीडेंट ने कितनी माताओं की गोद उजाड़ी हैं ?
न जाने कितनी सुहागिनों का सिंदूर उड़ा दिया ?
कितने ही बच्चे अनाथ हो गए ?
कितनी बहिनों की कलाईयों राखी को तरस गयी हैं  ?
देश की आजादी के बाद से जितने वीर सिपाही राष्ट्रीय रक्षा हेतु शहीद नही हुए
उतने तो एक वर्ष में ही सड़क पर तड़फ तड़फ कर दम तोड़ देते है ।
यूरोप के एक वैज्ञानिक ने अपने आलेख में लिखा हैं कि भारत की सड़कों पर अनपढ़ लोग ड्राइवर के रूप में यमराज बनकर पढ़े लिखे समझदार लोगो की हत्याए कर रहे है और भारत का संविधान आंख मूदकर उनको दंडित करने के बजाय मौन समर्थन करता है
भारत में मोटर वाईकिल के कानून कायदे अंग्रेजो के समय के बने हुए हैं
उस समय लगभग सारी गाड़ियां के मालिक अंग्रेज होते थे और सड़क पर मरने वाले भारतीय जनमानस होता था
इसलिए सड़क पर घटित दुर्घटनाओं में ड्राइवर को बहुत  ही मामूली दंड का प्रावधान रखे गए है ।
दो साल पहले नितिन गडकरी ने इस कानून में अपेक्षित सुधार किया था ।
किन्तु
अधिकतर राज्यो ने इसे लागू ही नही किया हैं अथवा जहां पर लागू किया भी हैं तो दंड को कमजोर करके लागू करने का ढोंग किया गया है ।।
सरकारे सस्ती लोकप्रियता के चलते सख्त कानून को लागू करने से कतराती रहती हैं ।
अब इस घटना को ही लीजिए दो नोजवानो का हत्यारा ड्राइवर एक घण्टे में ही जेल से बाहर आ जाएगा ।
हो सकता हैं कि उनकी जमानत सम्बंधित थानेदार ही ले ले , कोर्ट तक जाने की आवश्यकता भी नही रहे ।।
यदि लापरवाही से दुर्घटनाओं को अंजाम देने वाले ड्राइवर के लिए यदि मृत्युदंड का प्रावधान होता तो ऐसी दुर्घटना को अंजाम देने से पहले हर ड्राइवर 100 बार अवश्य सोचता ।
यह सही हैं कि उसने जान बूझकर घटना को अंजाम नही दिया है ।
किन्तु उसके मन मे कानून का भय होता तो 60 किलोमीटर की स्पीड से गाड़ी चलाता जिससे एक्सीडेंट होने पर भी जीवन के बचने की सम्भावनाए तो रहती ।
अब इस घटना को ही लीजिए इसमे मोटरसाइकिल सवार युवक लाख प्रयास करने पर भी क्या कर लेते क्योकि गलती सामने वाले गाड़ी चालक  कि ही थी ।
गाडियों के ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले न कोई ट्रेनिंग न कोई परीक्षा का आयोजन होता हैं
दलालों को पैसे दो , लाइसेंस लो
जबकि दुनिया के विकसित राष्ट्रों में यातायात में गाड़ी के ड्राइवर बनने से पहले कम से कम 9 महीनों के एक व्यवसायिक पाठ्यक्रम को पढ़कर सैद्धांतिक और प्रायोगिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही उनको लाइसेंस मिलता हैं
आपको जानकर यह घोर आश्चर्य होगा भारत सरकार के विभिन्न राज्यो द्वारा जारी ड्राइविंग लाइसेंस के आधार पर आप यूरोप अथवा अमेरिका की सड़कों पर गाड़ी ड्राइव नही कर करते हैं
यहाँ तक कि अरब देशों में भी भारतीयों को ड्राइवर को कठिन परीक्षा से गुजरने के बाद नया लाइसेंस जारी होता हैं ।।
अब बहुत हो गया
यह प्रथा बंद होनी ही चाहिए
इसके लिए भी जन आंदोलन की आवश्यकता रहेगी
वरना सिस्टम तो कुम्भकर्ण की नींद में सो रहा है ।।
हे ईश्वर कम से कम सरकार के RTO विभाग को तो सद्बुद्धि दे ताकि लाइसेंस जारी करने  से पहले कुछ न कुछ प्रशिक्षण की व्यवस्था अवश्य कर लेंवे ।।
भगवान दिंवगत आत्माओं को शांति प्रदान करे ।।
और परिवार जनों तथा मित्रो को इतनी शक्ति दे जो इस वज्रपात को झेल सके ।।
ओम शांति ॐ शांति ॐ शांति ।।

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