*समाज के युवाओं को लील रहा है "स्मैक" एवं "डोडा" की लत*
एक ही हफ्ते में दो मर्तबा मारवाड़ जाने का सौभाग्य मिला. शादियों का सीजन था, तमाम लोगों से मिलना हुआ. ढेर सारी राजी-ख़ुशी की बातें, हथाई, गप्प आदि-आदि.
लेकिन दोनों ही मर्तबा दिल्ली से आने से पहले अचानक गंभीर मसले सामने आ गए. पिछली मर्तबा जब दिल्ली वापसी से ठीक पहले सांचौर उपखंड के किसी गांव में गया तो वहां सबसे बड़ा विषय था, 'स्मैक'. और इस बार मर्तबा दिल्ली वापसी के वक़्त सबसे बड़ा विषय था, 'डोडा'.
इन विषयों का गंभीर होना स्वभाविक था क्योंकि दोनों ही मामलों में जवां लड़कों को जान से हाथ धोना पड़ा. पहले मसले की बात करें तो सांचौर उपखण्ड के गांव गुंदाऊ में था. सरपंच साब के घर तमाम मौजिज-बुजुर्ग लोग इस बात को लेकर बेहद चिंतित थे कि किस तरह कुछ दिन पहले पड़ौस के एक लड़के की 'स्मैक' ने जान ले ली. उनकी चिंता सिर्फ यह अकेली मौत नहीं थी, उनके मुताबिक यह तो महज शुरुआत है. आगे जिस तस्वीर का अनुमान ये लोग लगा रहे थे उसकी महज कल्पना ही बेहद डरावनी है. खासतौर पर जालौर जिले के सांचौर इलाके में पैदा हो रहे हालात की. इस इलाके में रानीवाड़ा, भीनमाल, बागोड़ा तहसील के भी कई इलाके शामिल किए जा सकते हैं.
बताया गया कि यहां 'स्मैक' जोधपुर से आया. अफीम-शराब तस्करी में सक्रिय लोग इसे जोधपुर से सांचौर इलाके में ले आये. (दावा तो ये भी किया गया कि सबसे पहले स्मैक 'खारा' नाम के एक गांव में आया, जिस गांव में मेरा ननिहाल है). शुरू में कुछ नवधनाढ्य और जल्द सम्पत्ति इकट्ठे (easy money) कर चुके युवक इसके शिकार बने. फिर देखते ही देखते तेजी से युवाओं का एक बड़ा वर्ग 'स्मैक' की चपेट में आ गया. वैसे तो इनमें से ज्यादातर युवा अफीम-शराब जैसे नशे से वाकिफ थे लेकिन 'स्मैक' की महिमा के सामने सभी परम्परागत नशे फेल थे. मुझे बताया गया कि सांचौर इलाके में 8 हजार युवा स्मैक की चपेट में हैं (इस दावे की पुष्टि के लिए मेरे पास कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है). ये ऐसे युवा हैं जो अपनी सुध-बुध पूरी तरह खो चुके हैं. इन्हें मां-बाप, पति-पत्नी-बटे-बेटियां किसी की कोई फिक्र नहीं हैं. इन्हें सिर्फ और सिर्फ 'स्मैक' चाहिए, किसी भी कीमत पर. यह भी बताया गया कि सांचौर में एक तरह की चायनीज तकनीक आ गई है जिससे नोट/पत्ती आदि जलाने के परम्परागत तरीके नहीं अपनाने पड़ते हैं. इस तकनीक में एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेट के जरिए नशा परोसा जाता है जिसके दो बड़े फायदे नशेड़ियों को होते हैं, एक तो अंगुलियों पर जलने के निशान नहीं होना और दूसरा, नशे की डोज लेने में ज्यादा समय नहीं लगना. तो इस तरह समाज का एक बड़ा और ऊर्जावान युवा वर्ग अंतहीन अंधकार की तरफ जा रहा है.
निजी तौर पर इसलिए भी चिंतित हूं क्योंकि करीब सालभर पहले मैं पंजाब (मालवा) के उस इलाके में था जो चिट्ठे, भूक्खी (स्मैक, डोडा-पोस्त आदि) के सबसे ज्यादा चपेट में था. यहां ड्रग्स न सिर्फ एक बड़ा चुनावी मसला था, इसके परिणाम भी सबके सामने थे. रोजाना अखबारों में नशे से मौत की खबरें (बहुत-सी खबरें लोकलाज के चलते छिपा भी दी जाती). आंखों के सामने ड्रग्स से मौत के वाकये. बड़े-बड़े घरों में दर्दनाक कहानियां. चारों तरफ एक अजीब-सा निराशाजनक माहौल. ऐसे लगता जैसे कि पूरा समाज ही इस भयानक नशे के सामने असहाय हो चुका हो. उन हालात को प्रत्यक्ष तौर पर देखने के बाद एक मर्तबा तो यह सोचकर भी रूह कांप उठती है कि पंजाब के वे हालात हमारे इस इलाके के भी हो जाएंगे? यदि वाकई हम ऐसे हालात की तरफ बढ़ रहे हैं तो जनप्रतिनिधियों, जागरूक नागरिकों को तुरंत कुछ करना होगा नहीं तो सब कुछ जल्द 'उड़ता' हुआ ही नजर आएगा जो सबकी काबू से बाहर होगा. चिंता का एक पहलू यह भी है कि तुलनात्मक रूप से 'स्मैक' जैसे नशे से छुटकारा पाने वाले लोगों की दर बेहद कम है.
दूसरा वाकया बाड़मेर से. तारीख, 20 फरवरी. खबर आई कि एक युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. मामला उसी इलाके का था जहां से मेरी दिल्ली वाली ट्रेन गुजर रही थी. जी, बाड़मेर का कवास-बायतु इलाका. 'डोडा' तस्करों की आपसी रंजिश में एक युवक को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया. पहले यहां 'डोडा' के बारे में बताना जरूरी. 'डोडा', अफीम के पौधे के सूखे फल होते हैं. दरअसल, हरे 'डोडे' से ही अफीम निकलता है. अफीम निकालने के बाद सूखा 'डोडा' अवैध तरीके से एक नशे के रूप में बाजार में आ जाता है. पश्चिमी राजस्थान डोडे का एक बड़ा बाजार है जिसके गढ़ हैं सांचौर और बाड़मेर. 'डोडा' पहले कानूनन सरकारी ठेकों पर बिकता था लेकिन करीब तीन साल अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसकी सरकारी बिक्री बंद कर दी गई. लेकिन अब भी यह आसानी से उपलब्ध है. हां, कीमत कुछ ज्यादा हो गई है. ऐसे में जल्दी पैसा कमाने का सबसे बड़ा जरिया है 'डोडा तस्करी'. ट्रेन में ही पता चला कि किस तरह डोडा तस्करी के चलते गैंगवार शुरू हो चुका है. बड़े तस्कर और उनके गुर्गे खुलेआम फायरिंग, फिरौती, अपहरण जैसे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं. बताया गया कि पिछले दो महीने में तो इस तरह की आपराधिक वारदातों की बाढ़-सी आ गई है.
हां, इन सबके पीछे पुलिस को दोष देना एक त्वरित और तार्किक टिप्पणी जरूर है. हो भी क्यों, सब जानते हैं कि पुलिस इन तस्करों के पालन-पोषण में बड़ी भूमिका अदा करती है. फिर अपना रिकॉर्ड दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर तस्करों की नकेल कसने की औपचारिकता भी निभाती है. मुझे बताया गया कि पुलिस अफसरों और तेज पुलिसकर्मियों की शानदार भौतिक जिंदगी या जीवन-शैली में सबसे बड़ी भूमिका तस्करों की है. खैर, पुलिस को दोष देना सच्चाई को नकारने का एक बेहद आसान बहाना है. हमारे समाज में तस्कर होना कोई बुरी चीज नहीं मानी जाती. तुरंत अथाह पैसे आ जाते हैं, फिर लम्बी गाड़ी, चौड़े घर, बड़े शौक. सरकारी सिस्टम से लेकर अपराध, सियासी जगत तक में लम्बे कनेक्शन. थोड़े ही दिनों में समाज के पंच-पंचायत सब नतमस्तक. जनप्रतिनिधियों को भी इनकी समय-समय पर जरूरत पड़ती रहती है. और एक समय आने पर ये तस्कर खुद भी जनप्रतिनिधि बन जाते हैं. ऐसे में समाज की युवा पीढ़ी में इनका रुतबा/क्रेज होना स्वभाविक है.
वैसे सांचौर और बाड़मेर के ये दो उदाहरण इस थ्योरी को भी साबित करते हैं कि जरूरी नहीं है कि 'पैसा' समाज में शांति और सुकून लाए. आज से कोई 15 साल पहले बाड़मेर गया कोई शख्स यकीन नहीं कर सकता कि यह वही 15 साल पहले वाला बाड़मेर है. जिन मार्गों पर ऊंटगाड़ियां दिखाईं देती थी उन पर आज दुनिया के नामी ब्रांड्स की महंगी से महंगी गाड़ियां दौड़ रही हैं. जिस सांचौर की धरती पर अक्सर धूल के कण उड़ते दिखाई देते थे उसी धरती पर आज देसी तो छोड़िए विदेशी किस्म के पेड़-पौधे लहलहा रहे हैं. इन दोनों केस स्टडीज के साथ 'आर्थिक सम्पन्नता और अपराध की दर के बीच सम्बन्ध' विषय पर एक शोध किया जा सकता है.
कुछ गुम-सी होती शांति और सुकून के बीच समाज को 'आर्थिक सम्पन्नता' और इसकी अत्यधिक 'चाहत' मुबारक़.
सौजन्य :-- ओम प्रकाश खिलेरी
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